कल झरोखे से जाती ज़िन्दगी को देखा,
तो पूछा, कहाँ जाती हो?
क्यूँ नहीं ठहर जाती कुछ पल को,
क्यूँ हर दम बस चलती जाती हो?
बोली, मैं बँधी घड़ी के काँटों से,
समय से मेरी प्रीत है,
मैं नहीं रुक सकती पल को भी,
चलना, बस चलना मेरी रीत है,
फिर पूछा, कहाँ थीं तुम,
क्यूँ छुप गयी थीं, जाकर दूर कहीं,
मैं ढूँढता रहा तुमको अपलक,
फिर थक कर बैठ गया, तुम थीं नहीं,
मैं अक्सर सोचता, तुम कहाँ रहती हो,
किस नगर, किस गली मिलती हो,
जो कभी याद उठ आये अगर,
किस डगर, किस दर कली सी खिलती हो,
और जो चलती ही जाती हो,
तो क्यूँ नहीं मिलती कभी,
आते जाते किसी भूले गीत सी,
यादों के बिसरे संगीत सी,
बस …ये एकाकी सोच ही थी, तुम न थीं,
ढूँढा हर जगह, पर न थीं,
कूँचे गलियारों में, ऊँचे चौबारों में न थीं,
तुम मरू की नदिया सी, कहीं न थी |
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(ज़िन्दगी)
क्या तुमने ढूँढा था मुझको, हँसते बचपन में?
कोयल की कू में, भँवरों की गुँजन में,
नदिया की कल कल में,
चुप में, कभी हलचल में,
क्या ढूँढा था बादल की छाया में,
रुपहले शिखरों, जग मग तारों की माया में,
तट के वीरानों में, लहरों के स्पन्दन में,
क्या तुमने ढूँढा था, मुझको अपने मन में?
मैं थी वहीं, तुमको तकती, सँवरती,
बारिश की बूँदों से तुमको भिगोती,
कभी झोकों से बालों को सहलाती,
कभी कँपते मौसम में लपटों सी जलती, तुमको गरमाती,
मैं थी माँ की लोरी में,
उन कहानियों की बोरी में,
गुस्से में छलके प्यार में,
झूठी तकरार में, मैं थी वहीं,
कभी मुस्काती आँखों के पानी में,
कभी ज़िद में, मनमानी में,
कभी पूरे में, कभी हिस्सों में,
कभी अरमानों के किस्सों में,
मैं थी, उस नन्हीं धड़कन में,
जो गोद में सिकुड़कर सोया था,
मैं थी उस यौवन में,
जिसे पाने को दिल रोया था,
मैं थी प्रीतम में,
प्रीतम की प्रीत में भी,
साँसों की गरमाहट में,
होंठों की नरमाहट में भी, मैं थी,
मैं थी यारों की बातों में,
खुशियों की बारातों में,
जब नाचे थे सब ढीठ बावरे,
मैं ही थी, तुझ संग साँवरे |
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ह्म्म, तो तुम ही थीं उस मस्ती में,
रौनक से सजती बस्ती में,
तुम थीं बहकी अंगड़ाई में,
तुम ही महकी पुरवायी में,
तुम थीं जब पाया सपना था,
मिला जो कोई अपना था,
तुम ही जब मोती बिखरे थे,
तुम थीं जब अरमाँ निखरे थे,
तो तुम थीं मेरे हर सुख में,
हर सुख की परछायी में,
हर लम्हे, मीठे पलछिन में,
तुम ही सोती रातों, जगते दिन में |
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हाँ, मैं थी ‘उन सब’ में,
और मैं ही हूँ सब में,
किसी एक में न रम कर,
मैं हूँ हर ढंग में, हर रंग में,
मैं जगती भोर में हूँ,
बुझती रातों में भी,
उठती लहरों में मैं हूँ,
मैं डूबी नावों में भी,
मैं रोशन महफ़िल में हूँ,
जलते दीपक में भी,
मैं चलते क़दमों में हूँ तो,
कुचले जीवन में भी,
नयी धड़कन में मैं,
मैं हूँ प्रसव में भी,
हार के शोक में मैं,
हूँ जीत के उत्सव में भी,
मैं फूल की खुशबू में,
चुभते काँटों में भी मैं हूँ,
मैं ख़ास में, हर आम में,
मैं शहद में, कड़वे जाम में भी मैं हूँ,
मैं हर रस में,
नीरस में मैं हूँ,
हर रंग में हूँ मैं,
बेरंग में भी मैं हूँ,
मैं न किसी दर, डगर,
तुम्हारे पास में मैं हूँ,
तुम पाओ, खो दो, हँस दो, रो दो,
हर अहसास में मैं हूँ,
मैं नहीं गुज़रे कल में,
न आगे मुस्तक़बिल में,
मैं आज की खुशबू में,
हर बहते पल में हूँ,
तुम्हारे साथ में मैं,
तुम से दूर भी मैं हूँ,
मैं तुमसे पहले भी थी,
तुम्हारे बाद भी मैं हूँ,
मुझको जी लो जी भर,
चढ़ने, ढलने से परे,
जगने सोने से परे,
जी लो ‘कवि’, उठने गिरने से परे |
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मैं समझा कुछ कुछ,
तेरे चंचल जज़्बातों को,
कुछ नासमझा सा समझा नासमझी में,
समझा तू हर हर में, समझा कुछ तेरी बातों को |









