हम नौकर हैं, सरकार भी,
हम इठलाते, खाते फ़टकार भी,
हम साहब के आगे पत्ते से हिलते हैं,
पर जो मिलना हो, हम मिलते हैं,
हम घर के बड़े, हैं छोटे बच्चे भी,
हम पुजते, समझे जाते टुच्चे भी,
हम अब तक पापा के थप्पड़ से डुलते हैं,
पर जो मिलना हो, हम मिलते हैं,
हम मशगूल बड़े, बेकार की दुनियादारी में,
कुछ सपनों की दीदारी में, कुछ यूँ ही मारा मारी में,
हम बेसुध से हर दिन, हर पल पिलते हैं,
पर जो मिलना हो, हम मिलते हैं,
हम यार हैं भई, अपनी दुनिया में जीते हैं,
साथ हों जब, मस्ती के जाम ही पीते हैं,
बर्फीली चादर हो या सागर से छूते फर्शों पर,
‘छकड़ी’ से रातों को सिलते हैं, जब हम मिलते हैं,
कितने झगड़े तकरार लिये, कितनी जेबों की मार लिये,
ताने-बाने बुनते, कितने तानों को सुनते,
हम बेशर्मों से, सब सहते चलते हैं,
पर जो मिलना हो, हम मिलते हैं |
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*छकड़ी => an awesome playing card game.
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